Kulgeet

 

सदियों से यह आबाद रहा
आश्रम का संगम शिक्षालय
इस दिव्या धरा का प्रखर तेज
धन ज्ञान प्रभा आलय - आलय

आभा मंडल - रक्षित आश्रम
आद्रत ले से पूरित धरती
अरुणाभा चहुदिश प्रकट हुई
कण - कण में नवजीवन भरती |

माँ सीता की ममती अंकोर
यह धन्य धरा पुलकित हर्षित
जँह सीता मढ़ी प्रसिद्ध हुई
करुणा जन - जन में स्पंदित

तप सिद्ध महर्षि दुर्वासा
का आश्रम शोभित एक ओर
ऋषि ऋषभदेव की धर्म ध्वजा
फहराती जिसके क्षितिज छोर

गंगा का निर्मल जल धरा
कल - कल निनाद अहरह गुंजित
तीरथपति की महिमा अपार
वात्सल्य - कलश अमृत पूरित

देवों की संतति हैं हम सब
निरबैर सेवा करते रहते प्रभुदित
पितृ - मातृ और आचार्य देव
आशीष हमें देते नित - नित | |